Saturday, December 5, 2009

कल की रोटी


जब आधी दुनिया सोती है
तब कुछ ऐसी आंखे होती हैं
जिनमें नींद तो होती है मगर
एक चिन्ता होती है वो "रोटी की"
वो आँखें होती हैं स्टेशन पर किसी कुली की
वो आँखें होती हैं ट्रकों पर सामान ढोने वालों की
वो आँखें होती हैं सर्द रातों में रिक्शा चलाने वालों का
वो आँखें होती हैं अपार्टमेंट के सामने पहरा देते चौकीदारों की
अग़र सीधी बात करें तो वो आँखें होती हैं
अगले कल की रोटी का जुगाड करने वालों की
उन मज़दूरों की जो रात और दिन
खटते हैं सिर्फ़ पापी पेट की खातिर......

4 comments:

  1. रोटी की चिन्ता...इससे बङी दुनिया में कोई और चिन्ता नही है।
    आशीष जी बहुत अच्छी सोच...
    बधाई...

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  2. बहुत ही सुंदर रचना है। ब्लाग जगत में द्वीपांतर परिवार आपका स्वागत करता है।
    pls visit....
    www.dweepanter.blogspot.com

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